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बिहार में शराबबंदी कानून पर नई बहस, विधायक माधव आनंद ने उठाई खत्म करने की मांग

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बिहार में नई सरकार बनने के बाद शराबबंदी कानून को लेकर सियासत गरमा गई है। आरएलएम विधायक माधव आनंद ने इसे खत्म करने की मांग करते हुए राजस्व नुकसान और अवैध कारोबार पर सवाल उठाए।

पटना/आलम की खबर:बिहार में नई सरकार के गठन के बाद एक बार फिर शराबबंदी कानून को लेकर सियासत तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार के सामने अब इस कानून की समीक्षा का मुद्दा खुलकर सामने आने लगा है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के विधायक माधव आनंद ने सीधे तौर पर इस कानून को राज्य के लिए नुकसानदायक बताते हुए इसे समाप्त करने की मांग उठाई है, जिससे राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

मुलाकात के बाद तेज हुई चर्चा

गुरुवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात के बाद माधव आनंद ने मीडिया के सामने अपने विचार खुलकर रखे। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता को नई सरकार से काफी उम्मीदें हैं और उन्हें भरोसा है कि राज्य विकास की नई ऊंचाइयों को छुएगा। हालांकि इसी दौरान उन्होंने शराबबंदी कानून को लेकर अपनी असहमति भी जाहिर की और कहा कि अब इस नीति की समीक्षा करना समय की जरूरत बन चुकी है।

माधव आनंद ने यह भी स्वीकार किया कि यह कानून पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एक ऐतिहासिक पहल थी, जिसने सामाजिक स्तर पर एक बड़ा संदेश दिया। लेकिन उन्होंने यह तर्क दिया कि किसी भी नीति की सफलता को समय-समय पर परखा जाना चाहिए और अगर उसमें खामियां दिखें तो सुधार या बदलाव जरूरी हो जाता है।

“राजस्व का बड़ा नुकसान, विकास पर असर”

विधायक ने शराबबंदी के आर्थिक पहलू पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस कानून के कारण बिहार को भारी राजस्व नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनका कहना है कि जिस राजस्व से राज्य के विकास कार्यों को गति मिल सकती थी, वह अब दूसरे राज्यों में जा रहा है, जहां शराब बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

उन्होंने कहा कि बिहार को बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की जरूरत है। ऐसे में राजस्व का यह नुकसान विकास की गति को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और व्यावहारिक निर्णय लेना चाहिए।

“कानून नहीं, जागरूकता है असली समाधान”

माधव आनंद ने अपने बयान में यह भी कहा कि केवल कानून बनाकर किसी सामाजिक बुराई को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि नशे के खिलाफ जनजागरूकता अभियान ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं।

उनका मानना है कि यदि लोगों को शराब के दुष्परिणामों के बारे में सही तरीके से जागरूक किया जाए, तो समाज में स्वाभाविक रूप से बदलाव आएगा। इसके विपरीत, सख्त कानून कई बार अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं, जैसा कि बिहार में अवैध शराब के नेटवर्क के रूप में देखा जा रहा है।

सदन से लेकर सड़क तक उठता रहा मुद्दा

यह पहला मौका नहीं है जब शराबबंदी कानून पर सवाल उठे हैं। इससे पहले भी कई बार विधानसभा और राजनीतिक मंचों पर इसकी समीक्षा की मांग उठती रही है। खुद माधव आनंद ने भी सदन में इस मुद्दे को उठाया था।

बिहार में 2016 से लागू इस कानून के दौरान लाखों लोगों पर कार्रवाई की गई और भारी मात्रा में शराब जब्त की गई। बावजूद इसके, जहरीली शराब से मौतों और अवैध कारोबार की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं, जिससे इस कानून की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े होते रहे हैं।

सरकार की चुनौती: संतुलन कैसे बनाए?

नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस मुद्दे पर संतुलित रुख कैसे अपनाती है। एक ओर शराबबंदी को सामाजिक सुधार के रूप में देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके आर्थिक और व्यावहारिक पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले ही विकास और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति की बात कर चुके हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी सरकार शराबबंदी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।

राजनीतिक असर और आगे की राह

शराबबंदी कानून पर छिड़ी यह नई बहस आने वाले समय में बिहार की राजनीति को और गर्मा सकती है। जहां एक ओर एनडीए के भीतर ही इस पर अलग-अलग राय सामने आ रही है, वहीं विपक्ष भी इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार इस कानून में कोई बड़ा बदलाव करती है, तो इसका असर सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर देखने को मिलेगा। वहीं, अगर इसे यथावत रखा जाता है, तो आलोचना का दौर जारी रह सकता है।

निष्कर्ष: बदलाव या निरंतरता?

बिहार में शराबबंदी कानून अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां इसके भविष्य को लेकर बड़े फैसले की जरूरत महसूस की जा रही है। माधव आनंद जैसे नेताओं की मांग ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

अब नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार इस पर क्या कदम उठाती है—क्या वह समीक्षा कर बदलाव का रास्ता अपनाएगी या फिर इस कानून को उसी सख्ती के साथ जारी रखेगी। जो भी फैसला होगा, उसका असर बिहार की सामाजिक संरचना और आर्थिक दिशा दोनों पर पड़ेगा।

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